Saturday, April 29, 2017

732

1- सत्या शर्मा  ' कीर्ति '⁠⁠⁠⁠की कविताएँ

 1- पुरुष

जाने कितनी सारी बातें
रख लेता हूँ खुद के ही अंदर
कहता नहीं हूँ किसी से
अपनी नम होती आँखें भी
अकसर छुपा सा लेता हूँ

कितनी बातें जो बेधती है मुझे
जैसे मेरे पिता द्वारा दी गई
लम्बी दहेज़ की लिस्ट पर मेरा सर
शर्म से झुक जाना

तुम्हें विदा कर लाते वक्त
तुम्हारे आँसुओं में खुद को
भीगते देखना

मेरे घरवालों द्वारा तुम्हें
दिए तानों पर आंतरिक वेदना
महसूस करना

तुम्हारी गर्भ की पीड़ा में
 खुद भी छटपटाना
तुम्हारे बुखार में जलते बदन को  देख
अंदर से डर सा जाना
तुम्हारे थके चेहरे को देख तुम्हारे लिए
एक कप कॉफ़ी बनाना

जब मैं तैयार होऊँ
तुम्हारी आँखों में खुद को
ढूँढना
लोगों की भीड़ में तुम्हारा
सानिध्य चाहना

मैं
रख लूँगा
ये सारी की सारी बातें
नहीं लिखूँगा कभी अपने
मन की बातें

लिखता रहूँगा
तुम्हारे सौंदर्य पर कविताएँ
तुम्हारे त्याग और बलिदानों की
अनगिनत बातें

पर नहीं लिखूँगा अपने
सारे जज़्बात
समेटता रहूँगा खुद में ही
खुद को उम्र भर

हीं लिखूँगा अपना
टूटना और बिखरना
क्योंकि मैं हूँ एक पुरुष
नहीं लिखूँगा अपने ऊपर
कोई कविता .......
-0-
2-मैं माँ होना चाहती हूँ

एक बंजर भूमि- सा स्तित्व लिये
संवेदना के तीरों पर खड़ी  कुछ अधूरी हसरतें हैं मेरी
 कि मैं माँ होना चाहती हूँ

हाँ , मैं बंजर हूँ
तो क्या मेरी ममता सिर्फ़ इसलिए अपरिभाषित रह जाएगी
कि मैं माँ नही हूँ ।
पर है क्या कसूर  मेरा
इस जैविक प्रक्रिया को मैंने तो नहीं किया था सृजित
इस अधूरेपन को दूर करके
पूर्ण मातृत्व का एहसास करना चाहती हूँ।
क्या करूँ र्वर नही मेरी कोख
पर बच्चे के नन्हे कोमल स्पर्श
अपने मन , अपनी आत्मा ,
अपने शरीर पर महसूस करना चाहती हूँ।

लोग कहते हैं तुम अपूर्ण हो
पर देखा है मैंने कली खिलते अपने भीतर
छोटी - छोटी  अँगुलियों को सहलाया है अपने ओठों से
मेरे अंदर भी अनेक धाराएँ है ममता की
जो दूध की नदियाँ बहाना चाहती है
क्या करूँ
कि कोंपल नहीं फूटती मेरे अंदर
पर देखो कैसे मेरी रुह ने लिपटा हैं
हजारों भ्रूण पुष्पित होने के लिए
कि कैसे मेरी हृदय की कोख ने धारण की हैं
नव जीवन की अनगिनत कल्पनाएँ
हाँ, मैं करती हूँ महसूस बढ़ते हुए जीव अपने अंदर ।
उसकी चंचलता , उसके पैर मारना उसके हिलने- सा।
उसके तुतलाते शब्द सुन पूरी रात जागने -सा
उसके गीले कपड़े को अपनी ममता से सूखने -सा
उसकी मासूम हँसी पर पूरी उम्र गुजार देने सा ....

लोग कहते हैं बहुत कष्टकारी होता है
प्रसव का सुखद  पल
मैं उस सुखद पल के कष्ट को झेलना चाहती हूँ
हाँ , बंजर, पर माँ बनना चाहती हूँ ...
 -0-
3-मन पंछी

और फिर
मन का पंछी
उड़ जाएगा छोड़
 एक दिन ये शरीर...

ये घर , ये दीवारें
बस यूँ ही देखते रहेंगे
मेरा मरना
पुकारें मुझे
पर उनकी आवाजें
यूँ ही गूँजकर दब सी जागी

पर नहीं सुनूँगी मैं
नही सुनेगा कोई भी
सब मेरे निर्जीव से शरीर के पास
अपने - अपने हिसाब से
करते रहेंगे ईश्वर पर
आरोप - प्रत्यारोप...


फिर भी नही उठूँगी मैं
चाहे चाय का खौलता पानी
सुख ही जाए
चाहे गीले आटे से किसी और से
रोटियाँ बन न पाएँ
चाहे शाम की पूजा अधूरी रह जाए
नहीं उठूँगी मैं

शायद ऑफिस से आ किसी रोज
तुम मुझे पुकारने लगो
शायद बच्चे किसी दिन मेरे
हाथों का खाना खाने
मचल उठें
पर फिर भी
हीं लौटकर आऊँगी मैं;
 क्योंकि मन का पंछी
तो उड़ चुकेगा
जीवन की सरहदों  के पार ....

-0-

Wednesday, April 26, 2017

731

 1-गिद्ध
-रमेशराज

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
चहचहाती चिडि़यों के बारे में
कुछ भी नहीं सोचते।

वे सोचते हैं कड़कड़ाते जाडे़ की
खूबसूरत चालों है बारे में
जबकि मौसम लू की स्टेशनगनें दागता है,
या कोई प्यासा परिन्दा
पानी की तलाश में इधर-उधर भागता है।

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
कोई दिलचस्पी नहीं रखते
पार्क में खेलते हुए बच्चे
और उनकी गेंद के बीच।
वे दिलचस्पी रखते हैं इस बात में
कि एक न एक दिन पार्क में
कोई भेड़िया घुस आगा
और किसी न किसी बच्चे को
घायल कर जागा।

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
मक्का या बाजरे की
पकी हुई फसल को
नहीं निहारते,
वे निहारते है मचान पर बैठे हुए
आदमी की गुलेल।
वे तलाशते हैं ताजा गोश्त
आदमी की गुलेल और
घायल परिन्दे की उड़ान के बीच।

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
रेल दुर्घटना से लेकर विमान दुर्घटना पर
कोई शोक प्रस्ताव नहीं रखते,
वे रखते हैं
लाशों पर अपनी रक्तसनी चौंच।

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
चर्चाएँ करते हैं
बहेलि, भेडि़, बाजों के बारे में
बड़े ही चाव के साथ,
वे हर चीज को देखना चाहते हैं
एक घाव के साथ।

पीपल जो गिद्धों की संसद है-
वे उस पर बीट करते हैं,
और फिर वहीं से मांस की तलाश में
उड़ानें भरते हैं।

बड़ी अदा से मुस्कराते हैं
‘समाज मुर्दाबाद’ के
नारे लगाते हैं
पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध।
-0-
2-आँसू      
विभा रश्मि

ठहर जा
बाहर न निकल
झूल जा
पलकों के नुकीले
फलक थाम
हीरक कण-सा
चमक बिखेर
सरित तरंग सा- कलकल
निर्झर -सा झर
कोमल कपोल पर
बह निर्बाध
अंतस् के तंत कस
मंत्र पढ़
कुछ अनगढ़ा
अपढ़ा
तू पढ़ / गढ़ ले ।
संपूर्ण जी
आत्म प्रकाशित
लौ सा -जल
व्यथा में से
पा जा अनमोल
चाहें तुच्छ क्यों न हो
देने को या भरने को 
रिक्त स्थान ।
प्रवाहित होने दे
भीतर का
सरल - तरल दृगों से
तोड़ के बंध / खोल के गाँठें
बंधकों को मुक्त कर ।

-0-

Wednesday, April 19, 2017

730

साँझ रंगीली आई है
 डॉ.कविता भट्ट(हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड)

साँझ रंगीली आई है नवपोषित यौवन शृंगार  लिये  
मुक्त छंद के गीतों का सृजन कुसुमित प्रसार  लिये  

अपरिचित अनछुआ व्योम भी आज सुपरिचित लगता है
तम में दीप शिखाओ का विजयगान सुनिश्चित लगता है

मंद श्वास की वृद्ध गति में यौवन का संचार  लिये  
जीवन से मिले प्रहारों के आशान्वित उपचार  लिये  

चंद्र-आलोक तिमिर को चीर  निशा का मौन समर्पण है
कोई खड़ा कपाट खोलकर रश्मियों का आलिंगन क्षण है

नर्म उष्ण लालिमामय अधरों पर झंकृत स्वर उद्गार  लिये  
बिना पदचाप ऋतुओं का परिवर्तित स्वप्नमय संसार  लिये

ये कौन मूक निमंत्रण पाकर  संवेदन-प्रणय-अभिसार  लिये  
साँझ रंगीली आई है नवपोषित यौवन शृंगार लिये  ।

-0-

Tuesday, April 18, 2017

729


गुंजन अग्रवाल (अनहद गुंजन )

युगों- युगों तक जग में इसकी सदा निराली शान रहे।
मैं रहूँ यहाँ या नही रहूँ ,पर कायम हिंदुस्तान रहे।

बच्चा -बच्चा राम कृष्ण हो बाला सीता राधा हो।
राहें सुगम सभी की हों पथ नही किसी के बाधा हो।
आँसू नही दिखे आँखों में अधर खिली मुस्कान रहे।
में रहूँ रहूँ या नही रहूँ..........................1

हिमगिरि ताज नाज- सा सिर पर गंध केसरी घाटी हो।
बलिदानों को तत्पर रहती राणा की परिपाटी हो।
कण -कण जिसका चन्दन जैसा गर्वित हिंदुस्तान रहे।
मैं रहूँ यहाँ या नही रहूँ..........................2

भेद नही हो दिल में कोई अधर प्रेम की बोली हो।
गले ईद के मिलती अपनी रंगीली -सी होली हो।
अनहद गुंजन गूँज मन्त्र ध्वनि घुलती कान अजान रहे।

मैं रहूँ रहूँ या नही रहूँ...........................3

Saturday, April 15, 2017

728

रेनू सिंह
1-शंकर छंद
[विधान-26 मात्रा,16,10 पर यति,अंत 21]

आदि अंत न कोई तिहारो,
     कूट करौ निवास।
तुम्ही शक्ति हौ तुम्ही भक्ति हौ
      जग की तुम्ही आस।।
जटा में गंगा विराज रही,
       गले सर्पन माल।
हाथ त्रिशूल औ डमरू है,
     चंदा सजौ भाल।।
बाघाम्बर है वस्त्र तिहारौ,
     नीलौ चढौ रंग।
भाँग धतूरौ तुमकूँ प्रिय है,
     पार्वती कौ संग।।
थोड़े में तुम खुश होवत हो,
     क्रोध बरसत आग।
पूरण बिगड़े काज सबन के,
    गावत प्रेम राग।।
-0-
2-सुभंगी छंद
[8,8,8,6 मात्राओं पर यति,पहली दूसरी यति और अंत तुकांत,चार चरण संतुकांत]

कान्हा मेरौ, चाकर तेरौ,
      आस तिहारी, वर देऔ।
यशोदा लाल,मुझको सँभाल,
      डूबे नैया,तुम खेऔ।।
एहि पुकारे,भाग सँवारे,
       तोहि शरण अब,हौं लेऔ।
मिले जो कष्ट,करौ अब नष्ट,
       अबगुण क्षमा,सब मेऔ।
-0-
3-सिंहनाद छंद
[112 121 112 2]

दिन रैन हौ सुमिर तेरौ।
हिय श्याम दास यह मेरौ।।
मद मोद मान पद लेऔ।
यह दास आज वर देऔ।।
-0-
4-विमला छंद
[112 222 111 1 2]

मइया तेरौ लाल सबन कौं।
करि दाया तारै सुख दुख सौं।।
मन तै जाकी जौ शरण गयौ।
भव कूँ भूले वौ मगन भयौ।।
-0-
5-स्वागता छंद
[212 111 211 22]

राम नाम जग कौ नित तारै।
जो जपे सबन कै दुख टारै।।
भूल कष्ट तुमसे जब रोवै।
काज भंग सब पूरण होवै।।
-0-
6-सिंहनाद छंद
[112 121 112 2]

बड़ भाग जौ दरस दीन्हीं।
किरपा सदा बहुरि कीन्हीं।।
हरलो प्रभू दुख हमारौ।
तुम आन भक्तन उबारौ।।
-0-
7-संयुत छंद
[112 121 121 2]

अब ध्यान देकर के सुनौ।
मन प्रेम गीत सदा गुनौ।।
करि दृष्टि पूरण आस कौं।
किरपा करौ प्रभु दास हौं।।
-0-
8-मत्तगयन्द छंद*
[211 211 211 211 211 211 211,22/12,11 पर यति]

खेल रहे ब्रज में अबकी हम,
नाच रहे सगरे अरु गावैं।
   नैनन सूँ तकरार करें बड़,
   रंग अबीर गुलाल उड़ावैं।।
तौं हँस आज भयौ सब आणद,
भांग चढै जिन वें मुसकावैं।
    केशव मोह लियो सबको हिय,
     हौं हरषे मन जौ सुख पावैं।।
-0-
9-चौपाई

प्यार बहिन भाई में ऐसा।
धूप छाँव के संगम जैसा।।
संग संग में सुख दुख बाँटे।
चुने परस्पर मग के काँटे।।
नेह रहे आपस में सच्चा।
रिश्ता कब होता ये कच्चा।।
मन की सारी बातें जानें।
लड़ना भिड़ना हक वो मानें।।
बचपन के सब खेल खिलौने।
हरदम होते साथ बिछौने।।
एक साथ रहना कम होता।
अपनापन कभी नहीं खोता।।
भाई के माथे की रोली।
होती विदा बैठती डोली।।
कष्ट पड़े वो उनसे हारे।
मिल रहते जीवनभर सारे।।

-0-

Tuesday, April 11, 2017

727


1-डॉ.पूर्णिमा राय

1-प्रीत
 स्नेह प्रीत की डोर से,मिल जाये मनमीत।
जीवन में मिले आसरा,जग भी लेता जीत।।
स्वार्थ भरी जग की डगर,रिश्तेनाते झूठ,
नाम खुमारी नानका,सच्ची तेरी प्रीत।।
 2-बेटी
खूबसूरत जिन्दगी का ,आगाज़ है बेटी।
विकट क्षणों में सुखदायी, सुरसाज है बेटी।
हो ग नशे के शिकार ,अब जगत में बेटे;
बनी पिता के सपनों की, परवाज़ है बेटी।।
 3- प्यार 

ज़िन्दगी सँवार दो।
एक नज़र निहार लो।।
हो चुकी लुका-छिपी 
 प्यार से ही प्यार हो।।

4- तमाशा
अजब तमाशा हुआ सड़क पर।
रोता अब क्यों होकर बेघर।।
दौलत की खींचा तानी में,
गिरा जोर से मनुज फिसल कर।।
5-
लकड़ी की काठी
और
बूढ़े की लाठी
दोनों ही
देती हैं आश्रय!!
फर्क बस इतना
एक 
ऊपर बिठाती है
दूसरी 
गिरने से बचाती है!!
-0-
-डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर(पंजाब)
-0-
2- नीतू सिंह राय

1-अमीर और गरीब

हर अमीर समझता है
कि गरीबी क्या बला है
उसे भली भाँति पता है
और यह उसका भरम
टूटने से भी नहीं टूटा है।
अमीर को यह गुमान है
कि गरीबी का उसे शत प्रतिशत ज्ञान है
यह सारी योजनाएं जो लागू हो रही रोज-रोज
उससे ही तो होता गरीबो का उत्थान है।
सिर्फ अमीर ही तो अपनी भागीदारी निभा रहा है
क्योकि कर तो सिर्फ वही चुका रहा है
गरीब तो बिना कर चुका ही
सारी सुविधाओं का हकदार है।
और भला क्या होती है जरूरते
और किन जरूरतों का गरीब को दरकार है
समझ में ही नहीं आता किसी अमीर को
कि आखिर गरीब अपनी किस जरूरत के लि लाचार है।
आसमाँ और समंदर सी है
अमीर और गरीब के बीच की तन्हाई
कभी आकाश सी ऊँचाई है
तो कभी पाताल सी गहराई
आखिर अंदाजा लगाये कोई कैसे
बीच में पड़ी है एक गहरी खाई।

 -0-
2- आभा


तुम्हें जब पता है
कि तुम बन सकते हो सूरज
फिर तुम तारा बनने को क्यों बेताब हो?
क्यों घबराते हो 
माने के  अँधियारे से
जब लिये फिरते तुम
रोशनी का सामान हो।
मुश्किलें तो आती ही है
सबकी राहों में 
सोचकर आगा तुम
क्यों इतना हैरान हो?
आगे बढ़ो बस अपनी राह पर
हो सवार उजाले की असंख्य किरणों पर
चलते चलो बस
अपनी मंजिल की राह पर।
तेरी चमक जो है 
सूरज की चंचल किरणों -सी
भला तारे में कहाँ समा पागी?
तेरे नूर की उज्ज्वल आभा से
सूरज की ही लालिमा साथ निभा पागी।
तुम्हें जब पता है
कि तुम बन सकते हो आताब
तो फिर तुम एक चिंगारी बनने को
क्यों बेजार हो?
बनना है तो बनो
एक ऐसी रौशनी
जिसके साये तले 
हर जर्रा गुलज़ार हो।