Monday, December 15, 2008

अविश्वस्ते न विश्वसेत्

अविश्वस्ते न विश्वसेत्

     पाकिस्तान पर भरोसा न कर हमें अपनी कार्यनीति व्यावहारिक और सुदृढ़ बनानी चाहिए ।ज़रदारी जी सुबह जो बयान ज़ारी करते हैं ,शाम होने तक उस से मुकर जाते हैं ।वे वहाँ की आम जनता के प्रति ज़वाबदेह न होकर सेना और आइ एस आई के प्रति ज़्यादा ज़वाबदेह हैं ।लगता है आज न सेना उनका हुक़्म मानने को तैयार है और न आई एस आई ।आतंकवादियों का और इस गुप्तचर शाखा का नाखून और मांस का रिश्ता है ।ऐसे हालात में ये इन तीनों में से किसी के भी विरुद्ध  नहीं जा सकते ।जिस दिन विरोध में जाएँगे ,उस दिन किसी दूसरे देश में जाकर ठिकाना ढूँढ़ना पड़ेगा;पाकिस्तान का अतीत इसी बात की पुष्टि करता है। ऐसी कौन -सी लोकतान्त्रिक सरकार रही है ,जिसने फ़ौज़ के सामने घुटने न टेके हों ?कोई माँ अपने पोषित बच्चे को मार सकती है क्या?फ़िर हम पाकिस्तान से कैसे उम्मीद लगाए हुए हैं कि वह अपने आतंकी बच्चे को मारे ।क्या पालकर पहलवान इसलिए बनाया था कि  भारत के कहने पर उसे मार दे ?पाकिस्तान का फ़ौजी शासक यह काम नहीं कर पाया तो बेचारे ज़रदारी क्या खाकर यह काम   करेंगे ?हम भारतवासी इस ग़लतफ़हमी से निकलें और खुद कठोर एवं कूटनीतिक क़दम उठाएँ

- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Wednesday, December 3, 2008

चिकौटियाँ



1-समय का सदुपयोग

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

अगर आप सरकारी कर्मचारी हैं तो समय का सदुपयोग सीखिए।घर में अधिक से समय बीवी- बच्चों के साथ बिताइए । नाते- रिश्तेदरों से बात करना हो तो दफ़्तर के समय में बात कर लीजिए। दफ़्तर का ही फोन मिल जाए तो फिर क्या कहना जीभर बात कीजिए ।आपके सामने जो अपने काम के लिए सिर पर सवार है ,उसकी चिन्ता मत कीजिए ।वह तो पूरे दिन को बर्बाद करने के लिए आया है । इन्तज़ार कराकर उसकी सहायता कीजिए ।उसको देखकर भी अनदेखा कर दीजिए । एक बार में ही किसी का काम निबटा देंगे तो वह दुबारा दफ़्तर की ख़ाक छानने क्यों आएगा ?सर्दी का मौसम है, कुछ समय धूप में खड़े होकर स्वास्थ्य लाभ कीजिए । यही बचा-खुचा-नुचा स्वास्थ्य रिटायरमेण्ट के बाद काम आएगा।

2-बुलेट प्रूफ़ जैकेट
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

आजकल चिन्ता है- निकम्मी बुलेट प्रूफ़ जैकेट की;जिन्हें पहनने के मुगालते में हमारे बहादुर पुलिसवाले शहीद हो गए । यह भ्रम मत रखिए कि हमारे नेता बहादुर नहीं हैं, वे निर्भय होकर नहीं रह सकते हैं ।यदि विश्वास न हो तो ये निकम्मी बुलेट प्रूफ़ जैकेट उन्हें पहना दीजिए ।पुलिसवालों के लिए नई ला दीजिए । नेतालोग देश के लिए क्या इतना त्याग नहीं कर सकते ? ये बहुत कुछ खा और पचा सकते हैं ।दो टके की गोली इनका बाल भी बाँका नहीं कर सकती ।शुभ कार्य में देरी क्या? हमारे बयान-बाँकुरे इस पुनीत कार्य में सबसे आगे रहेंगे । आदमी का इन्सल्टप्रूफ़ होना बहुत बड़ी ताकत है।इस ताकत के आगे बुलेट प्रूफ़ जैकेट की क्या औक़ात !
3 दिसम्बर 2008

Tuesday, December 2, 2008

रूबाइयाँ

:रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
25अपना तो दिल है मस्ताना इकले चलते जाएँगे ।
जलने वाले खूब जलें हम हँसते हैं हम गाएँगे ॥
दुनिया बस्ती बनी ठगों की हम किसको अपना कह दें।
जिसका मन होगा सच्चा हम उसको गले लगाएँगे ॥
26
जब से टूक-टूक हो बिखर गया हूँ ।
तब से और भी अधिक निखर गया हूँ।
मेरा ये पश्त मुक़द्दर रहा साथ मेरे
उम्मीदें लेकर मैं जिधर गया हूँ॥
27
बचाके दामन तेरी गली से गुज़र गया हूँ ।
यादों का साया रहा साथ मैं जिधर गया हूँ ॥
देना था सिला क्या चाँद यही मेरी वफ़ा का ।
तेरे दिल से अब न्शे की तरह उतर गया हूँ ॥
28
इस दिल पे तेरे क़दमों के निशान बाक़ी हैं।
महकते हुए ग़ेसुओं की पहचान बाक़ी है॥
हमेंचले गए छोड़कर तुम तो सरे-राह ।
फिर भी तुझे पा लेने के अरमान बाक़ी हैं ॥

29
रहती हैं हर वक़्त नशे में चूर आँखें।
कलेजे तक उतर जाती ये बेक़सूर आँखें ॥
खैर माँगो ख़ुदा से अपनी ज़िन्दगी की ।
हसीन क़यामत हैं ये पुरनूर आँखें ॥
30
डूबते हुए को किनारा ही बहुत है ।
अँधेरी रात में तारा ही बहुत है ॥
एक क्या हज़ार जानें लुटा दें तुझपे हम
कजरारी आँखों का इशारा ही बहुत है ॥

31
इन स्याह ग़ेसुओं में पनाह दे दो।
दिल तक पहुँचने की राह दे दो ॥
ताउम्र रहे दिल में तेरी हसरत ।
नादान दिल को वह ग़ुनाह दे दो॥
32
लिख-लिखकर मेरा नाम मिटाने वाले ।
तन्हाई में छुपकर आँसू बहाने वाले ॥
मेरी रुह की बेकली भला तू क्या जाने ।
यादों के निशान नहीं कभी जाने वाले ॥

Sunday, November 16, 2008

राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह का आयोजन







राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह का आयोजन


यहनेशनल बुक ट्र्स्ट इण्डिया द्वारा भारत के विभिन्न नगरों में 14-20 तक राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह का आयोजन किया जा रहा है।पुस्तक पढ़ने की संस्कृति के उन्नयन के लिए पं नेहरू जी ने 1 अगस्त 1957 में नेशनल बुक ट्र्स्ट इण्डिया की स्थापना की थी नेशनल बुक ट्र्स्ट इण्डिया ने राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह के अन्तर्गत देश के विभिन्न भागों में पुस्तका-विमोचन के साथ-साथ निबन्धप्रतियोगिता,विचार-विमर्श,कवि-दरबार आदि विभिन्न कार्यक्रमा की योजना बनाई है ।इसी सन्दर्भ में नेशनल बुक ट्र्स्ट इण्डिया नेहरू भवन दिल्ली में राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह के अवसर पर विभिन्न माध्यमों के द्वारा कहानी-कथन को प्रोत्साहित करने की योजना बनाई है कार्यक्रम का शुभारम्भ नेशनल बुक ट्र्स्ट इण्डिया के अध्यक्ष प्रो विपिन चन्द्रा जी के द्वारा पुस्तकालय ऑटोमेशन के उद्घाटन से हुआ एक महत्त्वपूर्ण योजना है जो पुस्तक प्रेमियों को जो्ड़ने का काम करेगी ।इसके बाद प्रो चन्द्रा जी ने पोस्टर एवं पुस्तक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया कहानीकथन सत्र में 6-12 आयु वर्ग के बच्चों के समक्ष चित्रकार जगदीश जोशी,श्रीमती क्षमा शर्मा ,श्रीमती दीपा अग्रवाल ने कहानीकथन के बारे में अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए। जोशी जी ने कहाचित्र के हिसाब से कहानी लिखना एक कठिन काम है ,कहानी के विषय पर चित्र बनाना हो तो यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि चित्रों में विविधता बनी रहे ।भारत में प्राय: 16 पृष्ठों की सचित्र पुस्तकों का प्रकाशन हो्ता है ;जिसमें 7-8 चित्रों के लिए जगह मिल पाती है चित्रों का कहानी के विषय के अथ तालमेल होना चाहिए चित्र कथा की सिच्युएशन के अनुसार परिवर्तनशील हों श्रीमती दीपा अग्रवाल ने कहानी का विशेष गुण बतायादूसरों को जोड़ना,संवाद स्थापित करना एवं व्यापक फलक पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान करना ।कहानी शब्दों के माध्यम से एक प्रकार का मानसिक पोषण है।,श्रीमती क्षमा शर्मा ने कहानी के लिए श्रोता की भागीदारी ,उत्सुकता को प्रमुख बताया बच्चों के बीच की कथावस्तु (बस्ता)को आधार बनाकर रोचक कहानी का सूत्रपात किया ।इसी प्रकार –‘एक जंगल थाको केन्द्र में रखकर पक्षी थे ,खिड़की थी, खिड़की से झाँकते बच्चे थे-इस प्रकार कहानी को बच्चों की सहभागिता से आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को समझाया ।वर्तमान परिस्थितियाँ कितनी कटु हो गई हैं कि बच्चों का कोमल मन भी उससे अछूता नहीं रह सका है ।गुड़गाँव के स्कूल के बच्चों द्वारा लिखी गई कहानियों के अन्त (सभी बच्चों ने कहानी का अन्त बम ब्लास्ट से किया था) की समानता पर चिन्ता प्रकट करते हुए कहाहमें हँसते दौड़ते बच्चे चाहिए जो कहानियाँ लिखी जाएँ वे शोषण गरीबी और अन्याय के खिलाफ़ हों अध्यक्ष पद से बोलते हुए प्रो विपिन चन्द्रा जी ने अपने बचपन में सुनी कहानी के माध्यम से जीवन के सकारात्मक पहलू को उभारने पर बल दिया ।श्री मानस रंजन महापात्र ने निदेशक श्रीमती नुज़्हत हसन के प्रति आभार प्रकट किया ;जिन्होंने इस कार्यक्रम को नए स्वरूप में प्रस्तुत करने का परामर्श दिया था ।श्री द्विजेन्द्र कुमार ने कार्य क्रम का संचालन किया दूसरे सत्र में प्रसिद्ध कथाकार श्रीमती सुरेखा पाणंदीकर ने विभिन्न विद्यालयों के छात्रों के सम्मुख रोचक ढग सेराक्षस की लोरीऔरकौन बनेगा राजाकहानियाँ सुनाईं ।इस सत्र में बच्चों ने भी कहानी में सहभागिता की बच्चों के चेहरों पर झलक रहे आत्मविश्वास और प्रसन्नता ने इस सत्र को बहुत रोचकता प्रदान की लाखों में छपने वाले अखबार बीस करोड़ बच्चों को भुलाने में पीछे नहीं हैं। अपठनीयता के वर्तमान संकट में इस तरह के कार्यक्रम कठिन तपिश में फुहार-सा वातवरण प्रदान करते हैं। इस अवसर पर प्रसिद्ध व्यंग्य चित्रकार श्री आबिद सुरती भी मौज़ूद थे ।पुस्तक प्रदर्शनी में पुस्तक महल ,साहित्य अकादमी ,आर्य बुक डिपो ,एन सी आर टी, नेशनल बुक ट्र्स्ट, प्रथम बुक्स रूम टू रीड इंडिया आदि प्रकाशकों ने भाग लिया यह प्रदर्शनी 20 नवम्बर तक रहेगी
प्रस्तुति :- रामेश्वर काम्बोजहिमांशु rdkamboj@gmail.com

Tuesday, November 11, 2008

रूबाइयाँ-


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
17
हाथ सब्रो-क़रार का छूटा तेरी गली में ।
पैमाना छलकते प्यार का फूटा तेरी गली मे॥
जब मिले आज तुम मुझे अजनबी की तरह ।
टूटा हुआ साज़ और टूटा तेरी गली में ॥
18
बेमुरव्वत पर हम अपनी जाँ निसार क्या करें ।
चन्द लम्हात को भला झूठा प्यार क्या करें ॥
झुककर जिसकी फिर उठ नहीं पाई नज़र ।
पत्थर के उस बुत का दीदार क्या करें ॥
19
ज़िन्दगी के सब अहसास मिटा दिए मैंने ।
अपने मज़ार के चिराग़ खुद बुझा दिए मैंने ॥
मौत से छूटे तो हमें ज़िन्दगी ले डूबी ।
बुते काफ़िर पर सभी सज़दे लुटा दिए मैंने ॥
20
अफ़साना आँसुओं का सुनता रहा ज़माना ।
दर्द उठा की छलका ज़िन्दगी का पैमाना ॥
अफ़सोस कि तुम भी बेरहम हो गए हो ।
मुझको नहीं गवारा तेरा नज़रेंचुराना॥
21
चन्द खुशियोंके लिए भला क्यों इतराता है तू।
चार घड़ी की ज़िन्दगी में जुल्मो-सितम ढाता है तू॥
बन सका न गर तू किसी के दर्द की मीठी दवा ।
जन्म देने वाली माँ की गोद क्यों लजाता है तू ॥
22
सिर्फ़ ईश्वर का नाम ही दु:ख-दर्द भागा देता है।
पशु को करें प्यार तो बाजी जान की लगा देता है ॥
कितना ही करो उपकार चाहे प्राण भी दे दो ।
पर हाय रे पापी इंसान तू फिर भी दगा देता है ॥
23
रोने में क्या धरा और क्या फ़रियाद करने में ।
क्या मिलेगा चाँद तुझे किसी को याद करने में ॥
अपने हाथों आशियाँ को तू लगादे आग ।
तड़पना ही मिलेगा तुझे दिल को आबाद करने में ॥
24
गहन अँधियारे में भी दीपक सदा अकेले जलता ।
नीरव नीले महाकाश में सूरज इकला चलता॥
सोता है संसार रात में चाँद जागता इकला ।
शैल-शृंग पर हिमखण्ड भी चुपके-चुपके गलता ॥