Wednesday, October 18, 2017

768

1-दीप जलाएँ
मंगल यादव
मंगल यादव

आओ दीप जलाएँ
मधुर, अंकुर, कलियों में तेज भरा
गीत भौरे गुन-गुनाएँ
आओ दीप जलाएँ
चारो तरफ उजाला है
फिर भी दिल काला है
कितनी सदियां और लगेंगी
प्रेम मधुर गुल खिलने में
आखिर क्यों घर में धुँआँ जलाएँ
आओ दीप जलाएँ
प्यार के बदले मिलेगा फूल
नफरत में काँटे- काँटे हैं

अच्छी जिंदगी क्यों गवाएँ
आओ दीप जलाएँ
सब समान हैं ईश की नजरों में
क्यों निंदा- भेदभाव करते हो
ईर्ष्या, द्वे , गर्व के पटाखे फोड़े
हँसते-हँसते गीत गाएँ
आओ दीप जलाएँ
-0-
मूल रूप से जौनपुर, उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं। मै इस समय राजस्थान पत्रिका, नोएडा में काम कर रहा हूँ। पत्रकारिता मेरा शौक है। बचपन से लिखने की आदत रही है। समय मिलने पर कुछ न कुछ ज़रूर लिख लेता हूं माँ सरस्वती की कृपा से अभी तक दो खण्ड काव्य समेत कई व्यंग्य और निबंध लिख चुका हूँ
Rajsthan Patrika, News Producer
+91 9540410887
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2-दीप
 रेनू सिंह
1
नए संकल्प
नई तागी और
उमड़ी है नई तरंग
जब रोशन हुआ आँगन
मन में जगी उमंग ।
2.
अपनों की ख़ुशी
कहीं जो खो ग थी
वक़्त के साथ
मिल ग फिर हमें
रोशनी में साफ-साफ
जब मिले सबके हाथ।
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टूण्डला(फ़िरोज़ाबाद)
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3-खामोशी
प्रियंका गुप्ता

चलो,
कुछ देर खामोश बैठते हैं
और सुनते हैं
हमारे दिलों की
धड़कनों को;
या फिर
दूर से आती किसी ट्रेन की
सीटी की गूँज
और उसके साथ
अपने पाँव के नीचे
हल्के से थरथराती
ज़मीन का कम्पन;
सुनना हो तो सुनो
घर के पिछवाड़े बने
उस छोटे से बगीचे के
एक अनदेखे कोने में छिपे
झींगुरों का संगीत;
और अगर कुछ देर फुरसत हो
तो सुन सकते हो
नदियों को गुनगुनाते हुए;
तुम जब चाहो तब
सुन सकते हो इनमें से कुछ भी
अपनी पसंद के हिसाब से
पर कभी कोशिश करना
अपनी पूरी ताकत लगा के सुनने की
मेरी अबोली अनगिनत आवाज़ें...।
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4-दीवाली गीत
   
  आरती आलोक वर्मा

ज्योत जलाई जो यादों की दिल में
उससे ही जीवन सजाये रखूँगी,
फिर ना अंधेरा कोई घर बना
आस का दीपक जला रखूँगी ।।

आँधी-तूफान का डर नहीं पालूँ
सारी बलाओं को हिम्मत से टालूँ
नेह का दीपक अनुराग की बाती
निष्ठा का घी जिसमें हरपल डालूँ

गम की घनघोर घटाएँ जो छाएँ
आंचल से दीप छुपाए  रखूँगी...
फिर ना अंधेरा कोई घर बनाए
आस का दीपक जलाए  रखूँगी ।।
ज्योत जलाई जो यादों की दिल में
उससे ही जीवन सजाए  रखूँगी ।।
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परिचय
आरती आलोक वर्मा
शिक्षा --स्नातकोत्तर- भूगोल
पेशा--गृहिणी,
शौक---लेखन, चित्रकारी,
सम्प्रति -विभिन्न पत्र पत्रिकओं में लेखन,प्रकाशन
आकशवाणी में कविताओं का प्रसारण
 
सम्पर्क: आरती वर्मा,
W/o
श्री आलोक कुमार वर्मा,C/o ऊं जगदीश भवन
पता --आनंद नगरसिवान 841226
9835213697-7277806541

artiverma1121@gmail.com

Monday, October 16, 2017

767

मुक्तक
डॉ.कविता भट्ट
1
सूखा खेत बरसती बदली हूँ मैं
आसुरी शक्तियों पर बिजली हूँ मैं ।
मुझे इस नीड़ से निकलने तो दो
ये मत पूछना कि क्यों मचली हूँ मैं ॥
2
फूल -पाँखुरी भी हूँ , तितली हूँ मैं
उमड़े तूफ़ानों से निकली हूँ मैं ।
असीम अम्बर में लहराने तो दो
ये कभी मत कहना कि पगली हूँ मै॥
3
गिरी , हौसलों से सँभली हूँ मैं
तभी तो यहाँ तक निकली हूँ मैं ।
शिखर पर पताका फहराने  दो
अभी तो बस घर से चली हूँ मैं ॥

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Monday, October 9, 2017

766

नवलेखन
माटी का मोल (हरियाणवी)
वर्षा राना

वर्षा राना

सत्य अहिंसा ना रहगी इब चालाकी हत्थयार होई
बिन सीढी मंजिल ढुंढै या कैसी पौध त्यार होई।।
खोटी करणी का घारा घलरया बिना न्यार गंड्यासा चलरया
जीन्नस आले खेत खोस कै ईब माटी का मोल रै लगरया।।

ढुंढे तै भी मिलते कोन्या बावन कलिये दामन
घाट बचे है गामां म्ह जनेऊ धारणीये बामण।।
आधी रात शिखर तै ढलगी हुया पहर का तड़का 
घणे मित्र तै दगा कुमागै भुल्ले बाप भाई का धड़का।।
आडै जस्टिन बिबर मुन्नी शीला नै निरे छडदम तारे है
लख्मीचंद रामसिंह की गेट्टी पै इन्है कहवाड़े मारे है।।
जमाकै विदेशी बाणा अर बछेरे की तरिया कूद कूद कै
 गाणां करकै थम कुणसे मैडल पैगे रै
बडे बुडढयां के खड़गे , तुर्रे अर धुन खाप की रुलागे रै।।
पह्लाम अपनी संस्कृति पश्चिमी सभ्यता के नंगे नाच पै रे उडाई
जिब यु सांग रास ना आया फेर बाबया के चकरा म्ह लुटायी।।
सारा करणीया धरणीया हौके क्युं तु अनजान अनबोल रै बणरया
जीन्नस आले .................................................

ब्रह्मा समान पूजनीय था पंचैती फैसलया तै पंचैत लड़ैथा
जेवड़े जिसे सबर आले माणस का साफ नियत तै इंसाफ करै था।।
समय का पहिया कड़थल खा गया किसा गजब यु चाला पटगया 
एके चेहरा सयामी दिखै नौ चेहरे रावण भी गोज म्ह धरगया।।
ठाडा पंचैती इज्जत, पिस्से , शोहरत आला होकै भी 
खोटी नित लालच पै धरगया
मेहनत करणीये का गाढा लहू भी रिशवत की चवन्नी म्ह पिसकै पानी बन गया।।
रै देख कै नै जिभ काढले कदे चवन्नी देणीया ही पैर ना धरजया 
जीन्नस आले .................................................

चलो संस्कृति नै बचान खातर कोई दूसरा राह टोहलयो रै 
छोड कै नै ड्रम, प्यानो, तबले घडूआ बांजु पै कोई देशी रागनी मोहलयो रै।।
जो टक्कर म्ह आवेगा म्हारी ओ जांदा ए खाट पकड़ैगा
नाड़ी जालेगी कुहणी म्ह ओ हफ्ता मुश्कल औटेगा।।
फेर कहवांगे डेठ मारकै हम आ बंशी, छोटूराम,लख्मी ,
हरफूल , तैयार देशी घी दूधां तै होरे है 
आज्यो डटज्यो जे दम हो तो थारे फूफे हरियाणे तै आ रहे है।।
यू ज्जबा , मेहनत , लगन इंद्रधनुष के सातो रंग पलटज्यागा
जूणसे जूणसे माटी पै नजर टिकयारे सारया नै मोल का बेरा पटज्यागा।।
      -0- गाँव/डाकघर-सग्गा, तहसील-निलोखेडी, जिला-करनाल -132001
  ( हरियाणा)                     

                          

Saturday, October 7, 2017

765

समय का समय
 डॉ सुषमा गुप्ता

रात भर वो चेहरा

मेरे हाथों में था...
उसकी आँखों में दिख रही थी
मुझे अपनी उदास आँखें ...
बीते हुए वक्त की राख ...
और
दर्द से उबलते पलों का धुआँ ।
बहुत चाहा मन ने
लौट आए बीता समय
पर
समय का समय बदलना...
आसाँ होता
तो क्या बात थी

एक रोज़
एक ठंडी- सी शाम
जब अचानक चले गए थे तुम..
उस रात मौसम से ज्यादा सर्द
ज़हन था मेरा ..
ठंडा.... ठहरा ...
और लगभग मरा हुआ ।
बहुत महीनों और बहुत सालों
के सूरज ने मिल कर
जद्दोजहद की  ...
तब कहीं कुछ गरमाहट
मेरे वजूद के हिस्से आई ...
पर प्राण  फूँके के नहीं
ये अब भी नहीं पता...
जड़ को चेतन करना
आसाँ होता
तो क्या बात थी

तुमने चाहा था कभी
मेरा
मुझ जैसा न होना...
कुछ ख्वाहिशें जताई थी
और कुछ बंदिशें
जोड़ दी उनके पीछे ....
जैसे यूँ ही आदतन
छोड़ दी जाए थाल में रोटी
तृप्ति के बाद...
कि जो बचा है
लो
वो बस तुम्हारा ....
पर
मन का पेट
बचे टुकड़ों से भरना
आसाँ होता
तो क्या बात थी

मेरे पास कल भी
नहीं थी ..
मेरे पास आज भी
नहीं है ...
वो जादुई स्याही
जो जिंदगी के पन्नों से
सहूलियत से
मिटा दे
आने जाने वाले
खानाबदोशों के
बेतरतीब से लिखे हर्फ़...
और फिर से कोरा कर दे
उसे नई कहानी के लिए ...
काले रंग पे रंग भरना
आसाँ होता
तो क्या बात थी

समय का समय बदलना ....
आसाँ होता
तो क्या बात थी !


-0-