Monday, August 14, 2017

756

डॉ.कविता भट्ट

(हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड)

जब सुलह के निष्फल हो जाया करते हैं, सभी प्रयास
शान्ति हेतु मात्र युद्ध उपाय, इसका साक्षी है इतिहास
एक सुई की नोंक भूमि नहीं दूँगा दुर्योधन हुंकारा था
हो निराश शांतिदूत कृष्ण ने कुंती का नाम पुकारा था  

वीर प्रसूता जननी- तेज़स्विनी नारी का उपदेश था
“धर्मराज! तुम युद्ध करो” ये महतारी का सन्देश था 
तुम निर्भय बन अत्याचारी की जड़ उखाड़ कर फेंको
कर्त्तव्य और धर्म पथ पर तुम आत्मत्याग कर देखो 

साहस भरे इन वचनों से कृष्ण प्रभावित हुए अपार
आगे चलकर ये गीता- कर्मयोग के बने थे आधार
मात्र पाँच गाँव की बात थी महाभारत के मूल में 
कश्मीर लगा सम्मान दाँव पर, सैनिक प्रतिदिन शूल में

कितने सैनिक लिपटे, लिपट रहे और लिपटेंगे अभी
तिरंगा पूछ रहा- अधिनायक! सोचो मिलकर जरा सभी
रात का रोना बहुत हो चुका अब सुप्रभात होनी चाहिए
बलिदानों पर लाल किले से निर्णायक बात होनी चाहिए

अंतिम स्टिंग, एक बार में ही सब आर-पार हो जा बस
कोबरे-किंग-साँप-सँपेरे-बाहर-भीतर,प्रलयंकार हो जा बस
तुम निर्भय हो, उठो कृष्ण बन लाखों अर्जुन बना डालो
चिर-शांति स्थापना के लिए अब सीमा को रण बना डालो  
 


Thursday, August 10, 2017

755

1-अम्मा की याद
-डॉ.भावना कुँअर

आज मुझे फिर अम्मा याद आई है
छूकर हवा जब मुझको है लौटी
याद आई है मुझे अम्मा की रोटी।
नहीं भूल पा हूँ आज भी-
उस रोटी की सौंधी-सौधीं खुशबू को
मिल बैठकर खाने के
उस प्यारे से अपनेपन को
साँझ ढलते ही
नीम के पेड़ की छाँव में
अपनी अम्मा के
सुहाने से उस गाँव में
चौकड़ी लगाकर सबका  बैठना
फिर दादा- संग किस्से कहानियाँ सुनना,सुनाना।
नहीं भूली मैं खेत-खलिहानों को
उन कच्चे- पक्के आमों को ।
जब अम्मा याद आती है
तब आँखें भर-भर जाती हैं।
खोजती हूँ उनको
खेतों में खलिहानों में
उस नीम की छाँव में
उन कहानियों में,उन गानों में
पर अम्मा नहीं दिखती
बस दिखती परछाई है।
न जाने ऊपर वाले ने
ये कैसी रीत चलाई है
हर बार ही किसी अपने से
देता हमें जुदाई है
और इस दिल के घरौंदें में
बस यादें ही बसाई हैं।
-0-
वे गलियाँ
भावना सक्सैना

कई धागों की उलझन से     
कई डोरों की जकड़न से
विलगना है उन्हीं सब से
कभी चीज़ें जो प्यारी थीं।

कई किस्से पुराने थे
कई बन्धन सुहाने थे
हो विस्मृत याद वो सारी
यही कोशिश हमारी थी।

कहाँ आसान था ये सब
पिघल रहता मन बरबस
इरादे से हुआ पर अब
कठिन यात्रा ये न्यारी थी।

नहीं अब आँख में आँसू
गजब का शांत मन हरसू
के अब भूली हैं वे गलियाँ
हवा से जिनकी यारी थी।

 -0-

Monday, August 7, 2017

754


प्रेम-सुरभित  पत्र
 डॉ कविता भट्ट
(हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड
 1
कितना भी जीवन खपा लो, अब तो सच्चा मित्र नहीं मिलता
हृदय-उपवन को महका दे जो, वो मादक इत्र नहीं मिलता
शब्द-ध्वनि-नृत्य-घुले हों जिसमें, अब वो चलचित्र हुआ दुर्लभ 
उर को सम्मोहित कर दे जो, अब रंगीन चित्र नहीं मिलता
2
जूठे बेर से भूख मिटा ले जो, अब वो भाव विचित्र नहीं मिलता
शिला-अहल्या बोल उठी जिससे, अब वो राम-चरित्र नहीं मिलता
विरह में भी जीवन भर दे जो, वो राधा-प्रेम ढूँढती हूँ
एक मुट्ठी चावल में , कान्हा का प्रेम पवित्र नहीं मिलता
3
मैत्री -दिवस के संदेश में, प्रेम-सुरभित  पत्र खोए किधर
तुम्हीं मिल जाना मुझे किसी भी  दिन किसी  भी मोड़ पर प्रियवर
आँसू पी जाएँ अधरों से,  वे प्रेमी अब कहीं  नहीं मिलते
छाया मैं तुम्हारी हूँ और तुम्हीं मेरे  प्राणों के तरुवर ।

  -0-

Thursday, August 3, 2017

753

रमेशराज की मुक्तछंद कविताएँ

1- गिद्ध

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
चहचहाती चिड़ियों के बार में
कुछ भी नहीं सोचते।

वे सोचते हैं कड़कड़ाते जाड़े की
खूबसूरत चालों है बारे में
जबकि मौसम लू की स्टेशनगनें दागता है,
या कोई प्यासा परिन्दा
पानी की तलाश में इधर-उधर भागता है।

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
कोई दिलचस्पी नहीं रखते
पार्क में खेलते हुए बच्चे
और उनकी गेंद के बीच।
वे दिलचस्पी रखते हैं इस बात में
कि एक न एक दिन पार्क में
कोई भेड़िया घुस आगा
और किसी न किसी बच्चे को
घायल कर जाएगा।

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
मक्का या बाजरे की
पकी हुई फसल को
नहीं निहारते,
वे निहारते है मचान पर बैठे हुए
आदमी की गुलेल।
वे तलाशते हैं ताजा गोश्त
आदमी की गुलेल और
घायल परिन्दे की उड़ान के बीच।

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
रेल दुर्घटना से लेकर विमान दुर्घटना पर
कोई शोक प्रस्ताव नहीं रखते,
वे रखते हैं
लाशों पर अपनी रक्तसनी  चोंच।

पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध
चर्चाएँ करते हैं
बहेलिये, भेडि़ए, बाजों के बारे में
बड़े ही चाव के साथ,
वे हर चीज को देखना चाहते हैं
एक घाव के साथ।

पीपल जो गिद्धों की संसद है-
वे उस पर बीट करते हैं,
और फिर वहीं से मांस की तलाश में
उड़ानें भरते हैं।

बड़ी अदा से मुस्कराते हैं
‘समाज मुर्दाबाद’ के
नारे लगाते हैं
पीपल के पेड़ पर बैठे हुए गिद्ध।
-रमेशराज-0-


2- बच्चा माँगता है रोटी

बच्चा माँगता है रोटी
माँ चूमती है गाल |
गाल चूमना रोटी नहीं हो सकता,
बच्चा माँगता है रोटी।

माँ नमक-सी पसीजती है
बच्चे की जिद पर खीजती है।
माँ का खीझना-नमक-सा पसीजना
रोटी नहीं हो सकता
बच्चा माँगता है रोटी।

माँ के दिमाग में
एक विचारों का चूल्हा जल रहा है
माँ उस चूल्हे पर
सिंक रही है लगातार।
लगातार सिंकना
यानी जली हुई रोटी हो जाता
शांत नहीं करता बच्चे भूख
बच्चा माँगता है रोटी।

माँ बजाती है झुनझुना
दरवाजे की सांकल
फूल का बेला।
बच्चा फिर भी चुप नहीं होता
माँ रोती है लगातार
माँ का लगातार रोना
रोटी नहीं हो सकता
बच्चा माँगता है रोटी।

बच्चे के अन्दर
अम्ल हो जाती है भूख
अन्दर ही अन्दर
कटती हैं  आंत
बच्चा चीखता है लगातार
माँ परियों की कहानियाँ सुनाती है
लोरियाँ गाती है
रोते हुए बच्चे को हँसाती है |

माँ परियों की कहानियाँ सुनाना 
लोरियाँ गाना 
रोते हुए बच्चे को ।हँसाना
रोटी नहीं हो सकता
बच्चा माँगता है रोटी |

माँ रोटी हो जाना चाहती है
बच्चे के मुलायम हाथों के बीच |
माँ बच्चे की आँतों में फ़ैल जाना चाहती है
रोटी की लुगदी की तरह |
बच्चा माँगता है रोटी |

बच्चे की भूख
अब माँ की भूख है
बच्चा हो ग है माँ |
बच्चा हो गयी है माँ
बच्चा माँ नहीं हो सकता
बच्चा माँगता है रोटी |
-0-




3-कागज के थैले और वह

उसके सपनों में
कागज के कबूतर उतर आए हैं
वह उनके साथ उड़ती है सात समुन्दर पार
फूलों की घाटी तक / बर्फ लदे पहाड़ों पर
वह उतरती है एक सुख की नदी में
और उसमें नहाती है उन कबूतरों के साथ।

उसके लिए अब जीवन-सदर्भ
केवल कागज के थैले हैं।
वह अपने आपको
उन पर लेई-सा चिपका रही है।
वह पिछले कई वर्षो से कागज के थैले ना रही है।

वह मानती है कि उसके लिए
केंसर से पीडि़त पति का प्यार
नाक सुड़कते बच्चों की ममता
सिर्फ कागज थैले हैं
जिन्हें वह शाम को बाजारों में
पंसारियों, हलवाइयों की दुकान पर बेच आती है
बदले में ले आती है
कुछ केंसर की दवाएँ
नाक सुडकते बच्चों को रोटियाँ
कुछ और जीने के क्षण।

कभी कभी उसे लगता  है
जब वह थैले बनाती है
तो उसके सामने
अखबारों की रद्दी नहीं होती
बल्कि होते हैं  लाइन से पसरे हुए
बच्चों के भूखे पेट।
वह उन्हें कई पर्तों में मोड़ती हुई
उन पर लेई लगाती हुई
कागज के थैलों में तब्दील कर देती है।
यहां तक कि वह भी शाम होते-होते
एक कागज का थैला हो जाती है / थैलों के बीच।

कभी-कभी उसे लगता है-
वह लाला की दुकान पर थैले नहीं बेचती,
वह बेचती है- बच्चों की भूख,
अपने चेहरे की झुर्रियाँ / पति का लुंज शरीर।

वैसे वह यह भी मानती है कि-
जब वह थैले बनाती है
तो वसंत बुनती है।
उसके सपनों में कागज के कबूतर उतर आते हैं,
जिनके साथ वह जाती है / सात समन्दर पार
फूलों की घाटी तक / बर्फ लदे पहाडों पर /
हरे-भरे मैदानों तक।
वह उतरती है एक सुख की नदी में
और उसमें नहाती है उन कबूतरों के साथ

-0-

Monday, July 31, 2017

752

पीपल प्रेमी की बाहों में

डॉ कविता भट्ट (हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड)

साँसे कुछ रुक-रुककर चली जा रही थी
धड़कन बीमार कुछ-कुछ रुकी जा रही थी
डॉक्टर ने भेजा दवा का लम्बा चिट्ठा लिखकर
आँखें कृश देह रूपसी की मुँदी जा रही थीं।

जीवन से क्षुब्ध, तन से दु:खी  हो जा रही थी
व्यथित, पसीने से नहा, रोतीं-कुढ़ी जा रही थी
शीतल स्पर्श पाकर, वो रुकी कुछ ठिठककर
पीपल प्रेमी मुस्कुराता खड़ा, बाहें खुली जा रही थीं।

आँचल गिरा, उसकी बाहों में सिमटी जा रही थी
सरसराहट पत्तियों की कानों में घुली जा रही थी
प्रेमगीत धुन पर, दुलारा-सहलाया उसने जी भरकर
प्रिय की साँसे जीवन को साँसें दिए जा रही थीं।

जिसके चुम्बन से वो इतना लहरा रही थी
रूप का लोभ न था, इसके प्रेम पर इतरा रही थी
यौवन-मोह तजे योगी सा- लिंग-धर्म-जाति से ऊपर
प्रेम बाँटती असंख्य बाहें, जीवन-अमृत बरसा रही थीं।

जिसकी खोज में उम्र निकलती ही जा रही थी
स्त्री-पुरुष-शरीरों की परिधि से रहित रटे जा रही थी                                                   
काश! मानव में भी फूटें ऐसे ही उन्मुक्त प्रेम-निर्झर
कविता’ पीपल प्रेमी की बाहों में ये बुदबुदा रही थी


-0-
2-गुंजन अग्रवाल
गीत
कैसे ये तीज मनाऊँ मैं।
कैसे तो रीझ दिखाऊँ मैं।

बिन साजन सूना सावन है।
सूना ये मन का आँगन है।
धूमिल आंखों का काजल है
घिरता यादों का बादल है
तुझको तो सनम बुलाऊँ मैं।
कैसे तो तीज मनाऊँ मैं.......

झूलों पर पींग भरें सखियाँ
यादें झरती रहती अँखियाँ
हाथों की मेहंदी चिढ़ा रही।
सौंधी सी महक उड़ा रही।
जब तुझको पास न पाऊँ मैं।
कैसे तो तीज मनाऊँ मैं........

चंचल सी शोख हसीना- सी।
पुरवा संग झूम सफीना -सी।
पुरवा जब छेड़ा करती थी।
मीठी अँगड़ाई भरती थी।
अब गीत न कजरी गाऊँ मैं।
कैसे तो तीज मनाऊँ मैं.....


-0-