Wednesday, April 19, 2017

730

साँझ रंगीली आई है
 डॉ.कविता भट्ट(हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड)

साँझ रंगीली आई है नवपोषित यौवन शृंगार  लिये  
मुक्त छंद के गीतों का सृजन कुसुमित प्रसार  लिये  

अपरिचित अनछुआ व्योम भी आज सुपरिचित लगता है
तम में दीप शिखाओ का विजयगान सुनिश्चित लगता है

मंद श्वास की वृद्ध गति में यौवन का संचार  लिये  
जीवन से मिले प्रहारों के आशान्वित उपचार  लिये  

चंद्र-आलोक तिमिर को चीर  निशा का मौन समर्पण है
कोई खड़ा कपाट खोलकर रश्मियों का आलिंगन क्षण है

नर्म उष्ण लालिमामय अधरों पर झंकृत स्वर उद्गार  लिये  
बिना पदचाप ऋतुओं का परिवर्तित स्वप्नमय संसार  लिये

ये कौन मूक निमंत्रण पाकर  संवेदन-प्रणय-अभिसार  लिये  
साँझ रंगीली आई है नवपोषित यौवन शृंगार लिये  ।

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Tuesday, April 18, 2017

729


गुंजन अग्रवाल (अनहद गुंजन )

युगों- युगों तक जग में इसकी सदा निराली शान रहे।
मैं रहूँ यहाँ या नही रहूँ ,पर कायम हिंदुस्तान रहे।

बच्चा -बच्चा राम कृष्ण हो बाला सीता राधा हो।
राहें सुगम सभी की हों पथ नही किसी के बाधा हो।
आँसू नही दिखे आँखों में अधर खिली मुस्कान रहे।
में रहूँ रहूँ या नही रहूँ..........................1

हिमगिरि ताज नाज- सा सिर पर गंध केसरी घाटी हो।
बलिदानों को तत्पर रहती राणा की परिपाटी हो।
कण -कण जिसका चन्दन जैसा गर्वित हिंदुस्तान रहे।
मैं रहूँ यहाँ या नही रहूँ..........................2

भेद नही हो दिल में कोई अधर प्रेम की बोली हो।
गले ईद के मिलती अपनी रंगीली -सी होली हो।
अनहद गुंजन गूँज मन्त्र ध्वनि घुलती कान अजान रहे।

मैं रहूँ रहूँ या नही रहूँ...........................3

Saturday, April 15, 2017

728

रेनू सिंह
1-शंकर छंद
[विधान-26 मात्रा,16,10 पर यति,अंत 21]

आदि अंत न कोई तिहारो,
     कूट करौ निवास।
तुम्ही शक्ति हौ तुम्ही भक्ति हौ
      जग की तुम्ही आस।।
जटा में गंगा विराज रही,
       गले सर्पन माल।
हाथ त्रिशूल औ डमरू है,
     चंदा सजौ भाल।।
बाघाम्बर है वस्त्र तिहारौ,
     नीलौ चढौ रंग।
भाँग धतूरौ तुमकूँ प्रिय है,
     पार्वती कौ संग।।
थोड़े में तुम खुश होवत हो,
     क्रोध बरसत आग।
पूरण बिगड़े काज सबन के,
    गावत प्रेम राग।।
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2-सुभंगी छंद
[8,8,8,6 मात्राओं पर यति,पहली दूसरी यति और अंत तुकांत,चार चरण संतुकांत]

कान्हा मेरौ, चाकर तेरौ,
      आस तिहारी, वर देऔ।
यशोदा लाल,मुझको सँभाल,
      डूबे नैया,तुम खेऔ।।
एहि पुकारे,भाग सँवारे,
       तोहि शरण अब,हौं लेऔ।
मिले जो कष्ट,करौ अब नष्ट,
       अबगुण क्षमा,सब मेऔ।
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3-सिंहनाद छंद
[112 121 112 2]

दिन रैन हौ सुमिर तेरौ।
हिय श्याम दास यह मेरौ।।
मद मोद मान पद लेऔ।
यह दास आज वर देऔ।।
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4-विमला छंद
[112 222 111 1 2]

मइया तेरौ लाल सबन कौं।
करि दाया तारै सुख दुख सौं।।
मन तै जाकी जौ शरण गयौ।
भव कूँ भूले वौ मगन भयौ।।
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5-स्वागता छंद
[212 111 211 22]

राम नाम जग कौ नित तारै।
जो जपे सबन कै दुख टारै।।
भूल कष्ट तुमसे जब रोवै।
काज भंग सब पूरण होवै।।
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6-सिंहनाद छंद
[112 121 112 2]

बड़ भाग जौ दरस दीन्हीं।
किरपा सदा बहुरि कीन्हीं।।
हरलो प्रभू दुख हमारौ।
तुम आन भक्तन उबारौ।।
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7-संयुत छंद
[112 121 121 2]

अब ध्यान देकर के सुनौ।
मन प्रेम गीत सदा गुनौ।।
करि दृष्टि पूरण आस कौं।
किरपा करौ प्रभु दास हौं।।
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8-मत्तगयन्द छंद*
[211 211 211 211 211 211 211,22/12,11 पर यति]

खेल रहे ब्रज में अबकी हम,
नाच रहे सगरे अरु गावैं।
   नैनन सूँ तकरार करें बड़,
   रंग अबीर गुलाल उड़ावैं।।
तौं हँस आज भयौ सब आणद,
भांग चढै जिन वें मुसकावैं।
    केशव मोह लियो सबको हिय,
     हौं हरषे मन जौ सुख पावैं।।
-0-
9-चौपाई

प्यार बहिन भाई में ऐसा।
धूप छाँव के संगम जैसा।।
संग संग में सुख दुख बाँटे।
चुने परस्पर मग के काँटे।।
नेह रहे आपस में सच्चा।
रिश्ता कब होता ये कच्चा।।
मन की सारी बातें जानें।
लड़ना भिड़ना हक वो मानें।।
बचपन के सब खेल खिलौने।
हरदम होते साथ बिछौने।।
एक साथ रहना कम होता।
अपनापन कभी नहीं खोता।।
भाई के माथे की रोली।
होती विदा बैठती डोली।।
कष्ट पड़े वो उनसे हारे।
मिल रहते जीवनभर सारे।।

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Tuesday, April 11, 2017

727


1-डॉ.पूर्णिमा राय

1-प्रीत
 स्नेह प्रीत की डोर से,मिल जाये मनमीत।
जीवन में मिले आसरा,जग भी लेता जीत।।
स्वार्थ भरी जग की डगर,रिश्तेनाते झूठ,
नाम खुमारी नानका,सच्ची तेरी प्रीत।।
 2-बेटी
खूबसूरत जिन्दगी का ,आगाज़ है बेटी।
विकट क्षणों में सुखदायी, सुरसाज है बेटी।
हो ग नशे के शिकार ,अब जगत में बेटे;
बनी पिता के सपनों की, परवाज़ है बेटी।।
 3- प्यार 

ज़िन्दगी सँवार दो।
एक नज़र निहार लो।।
हो चुकी लुका-छिपी 
 प्यार से ही प्यार हो।।

4- तमाशा
अजब तमाशा हुआ सड़क पर।
रोता अब क्यों होकर बेघर।।
दौलत की खींचा तानी में,
गिरा जोर से मनुज फिसल कर।।
5-
लकड़ी की काठी
और
बूढ़े की लाठी
दोनों ही
देती हैं आश्रय!!
फर्क बस इतना
एक 
ऊपर बिठाती है
दूसरी 
गिरने से बचाती है!!
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-डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर(पंजाब)
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2- नीतू सिंह राय

1-अमीर और गरीब

हर अमीर समझता है
कि गरीबी क्या बला है
उसे भली भाँति पता है
और यह उसका भरम
टूटने से भी नहीं टूटा है।
अमीर को यह गुमान है
कि गरीबी का उसे शत प्रतिशत ज्ञान है
यह सारी योजनाएं जो लागू हो रही रोज-रोज
उससे ही तो होता गरीबो का उत्थान है।
सिर्फ अमीर ही तो अपनी भागीदारी निभा रहा है
क्योकि कर तो सिर्फ वही चुका रहा है
गरीब तो बिना कर चुका ही
सारी सुविधाओं का हकदार है।
और भला क्या होती है जरूरते
और किन जरूरतों का गरीब को दरकार है
समझ में ही नहीं आता किसी अमीर को
कि आखिर गरीब अपनी किस जरूरत के लि लाचार है।
आसमाँ और समंदर सी है
अमीर और गरीब के बीच की तन्हाई
कभी आकाश सी ऊँचाई है
तो कभी पाताल सी गहराई
आखिर अंदाजा लगाये कोई कैसे
बीच में पड़ी है एक गहरी खाई।

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2- आभा


तुम्हें जब पता है
कि तुम बन सकते हो सूरज
फिर तुम तारा बनने को क्यों बेताब हो?
क्यों घबराते हो 
माने के  अँधियारे से
जब लिये फिरते तुम
रोशनी का सामान हो।
मुश्किलें तो आती ही है
सबकी राहों में 
सोचकर आगा तुम
क्यों इतना हैरान हो?
आगे बढ़ो बस अपनी राह पर
हो सवार उजाले की असंख्य किरणों पर
चलते चलो बस
अपनी मंजिल की राह पर।
तेरी चमक जो है 
सूरज की चंचल किरणों -सी
भला तारे में कहाँ समा पागी?
तेरे नूर की उज्ज्वल आभा से
सूरज की ही लालिमा साथ निभा पागी।
तुम्हें जब पता है
कि तुम बन सकते हो आताब
तो फिर तुम एक चिंगारी बनने को
क्यों बेजार हो?
बनना है तो बनो
एक ऐसी रौशनी
जिसके साये तले 
हर जर्रा गुलज़ार हो।

Sunday, April 9, 2017

725

ताँका :डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा1घिरी घटाएँहो गया था आकाशगहरा कालासंकल्पों के सूरजदेते रहे उजाला ।2पवन संगनाच उठीं पत्तियाँकली मुस्काईसुनहरा झूमरपहन कौन आई ?3डोरी से बँधीपतंग हूँ मैं प्यारीऊँचाइयों पेदिखो न दिखो तुमपर लीला तुम्हारी ।।-0-


Saturday, April 8, 2017

724


 1- श्वेता राय

अप्रैल 1857

सत्तावन था वर्ष सदी का,धरती ने ली अँगड़ाई।

अंग्रेजों की चाल समझकर, जगी यहाँ की तरुणाई।

।कहते थे विद्रोह जिसे वो, आज़ादी की थी ज्वाला।

जिसकी लपटों ने गोरों की, गद्दी को झुलसा डाला।।

प्रथम राह वो आज़ादी की, बांध कफ़न सब निकल पड़े।

उत्तर भारत के सब वासी, अंग्रेजों से खूब लड़े।।

अंग अंग में जोश भरा था, जन जन में तूफ़ान भरा।

धरती हो आज़ाद हमारी, मन में ये अरमान भरा।।

बलिया के थे वीर सिपाही,मंगल जिनका नाम था।

ईस्ट इण्डिया की सेना में, लड़ना जिनका काम था।।

पहला शंख फूंक कर जिसने, महायज्ञ प्रारम्भ किया।

समिधा में जीवन को अपने, बढ़कर जिसने दान दिया।।

मेरठ की इस दीप शिखा से, जगमग सारा देश हुआ।

गोरे शासक भी थे सहमे, जोश भरा परिवेश हुआ।।

बलिवेदी पर चढ़ कर मंगल, द्वार मुक्ति का खोल गए।

राष्ट्रप्रेम है धर्म हमारा, हँसकर सबसे बोल गए।।

उनकी अर्थी पर ही अपने,सपनो का संसार बसा।

अंग्रेजो भारत तुम छोडो, कहने का हुंकार बसा।।

मंगलपांडे को मन में रख, दुर्गम पथ पर सभी बढ़ो।

शीश झुका बलिदान दिवस पर, नवल नित्य प्रतिमान गढ़ो।।

【मंगल पांडे की स्मृतियों को नमन】




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2-चिलमन- अनिता मण्डा


चिलमन-अनिता मण्डा
यमुना पर पतवार चलाते
मत्स्यगंधा के दो हाथ
भूल गए थे क्या
प्रतिरोध की भाषा
या मन में अतिक्रमण 
कर दिया था लोभ ने
फूलों -सा महकने की इच्छा ने
छोड़ दी थी जग की मर्यादा
कौन-सा रंग अधिक गहरा था
महत्वाकांक्षाविवशताआशंका
एक मायावी द्वीप
एक कोहरे की चिलमन
और जन्म हुआ
अमर महाकाव्य के
 -0-

3-प्रियंका गुप्ता

 चले आना

कभी कोई नज़्म
पुकारे तुम्हें
तो चले आना
नज़्मों के पाँव नहीं होते
पर रूह होती है उनमें भी
ऐसा न हो
कि सुन के भी अनसुना कर दो तुम
रूह बर्दाश्त नहीं करती अनसुना किया जाना
बसबता रही
ताकि तुम चैन से सो सको...।
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Friday, April 7, 2017

723

'घुंगरी' उत्सव तब ही मनाएगी
डा.कविता भट्ट
हे०न०ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड

सिसकते-प्रश्नों के उत्तर
ये पहाड़न जब पा जाएगी
झुकी कमर में प्राण-संचार होगा
झुर्रियों में धँसी हँसी- आँख नचाएगी
सरकारों का उत्सव 'घुंगरी' तब मनाएगी

ऊँची-नीची पहाड़ी पगडण्डी पर
कोई गर्भवती प्राण नहीं गँवाएगी
गाँव-गाँव कस्बे-कस्बे प्रसूति-डॉक्टर
स्वास्थ्य-सुविधा जब भी पा जाएगी
सरकारों का उत्सव 'घुंगरी' तब मनाएगी

जब अल्ट्रा साउंड साउंड करेगा
एक्सरे स्वास्थ्य किरण फहराएगी
स्वस्थ वार्ड अस्पताल पदचाप करेगा
खुश होकर ग्लूकोज की बोतल लहराएगी
सरकारों का उत्सव 'घुंगरी' तब ही मनाएगी

ठेकों से निकले शराबी पति को
जब अपना निष्प्राण तन न थमाएगी
चेहरे पर झुर्री उगाते बोझिल दिनों और
घरेलू हिंसक रातों से जब मुक्ति पा जाएगी
सरकारों का उत्सव 'घुंगरी' तब ही मनाएगी

देश को बिजली-पानी देता प्रदेश
जब स्वयं बिजली-पेयजल पा जाएगा
उसकी बिटिया उसके जैसे बोझ न ढोकर
पढ़-लिखकर इतिहास रच नाम कमाएगी
सरकारों का उत्सव घुंगरी तब ही मनाएगी

शिक्षित बेरोजगार बेटे की जवानी
सुदूर कहीं पलायन की भेंट न चढ़ेगी 
ख़स्ताहाल रोड- एक्सीडेंट में अपना खोकर
जब यह पहाड़न रो-रो पत्थर न हो पाएगी
सरकारों का उत्सव 'घुंगरी' तब ही मनाएगी
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'घुंगरी'= पहाड़ी महिला हेतु प्रयुक्त संज्ञा